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प्रेम जहां – परमेश वहां - लीलावती भागवत

Description:

लेव ताल्स्तोय की कथा पर आधारित |



प्रेम जहां – परमेश वहां रूस देश का एक छोटासा गांव। उसमें मार्तिन नाम का एक मोची रहता था। मार्तिन का घर, घर क्या था, एक छोटा-सा कमरा था- बिलकुल नीचेवाली मंजिल पर। कमरे में जो खिड़की थी उससे बाहर का सब कुछ दिखाई देता था। उस खिड़की से मार्तिन आने-जाने वालों के पैर देख सकता था और उन पैरों से वह पहचाना सकता था कि रास्ते पर कौन जा रहा है। कैसे? बिलकुल आसान बात थी। उन लोगों के जूते तो मार्तिन ही बनाता था- पूरे गांववालों के जूते! ...अरे, यह जूता तो मैंने ही बनाया है... हां, इस जूते की मरम्मत तो अभी-अभी की थी मैंने... यह, यह तो सरकारी जूता है। मेरे हाथ जैसी सिलाई थोड़े ही है इसकी। मैं कभी ऐसा जूता नहीं बनाऊंगा... और इस छोटी लड़की की यह चप्पल? इसकी सिलाई तो मेरे ही हाथ की है... ओह, इस बूढे मुन्शी जी का जूता तो फटने को आया है। हो सके तो दुसरा जूता तैयार रखना होगा इनके लिए। एक-दो महीने में तो आ ही जायेंगे नये जूते के लिए... यह सेठ जी तो इतने मक्खीचूस हैं कि पुराने जूते पर नये चमडे का पेबन्द लगवाते रहते हैं हमेशा.... मार्तिन यही सब सोचता अपने काम में लगा रहता। उसके पास काम भी खूब आता था। लोग कहते, “अरे भाई, जूता बनवाना है तो तुम मार्तिन के हाथ से ही बनवा लो।” “क्यों?” “वह काम बहुत अच्छी तरह से करता है।” “हां, और माल भी अच्छा इस्तेमाल करता है।” “और कीमत देखो, कितनी कम बताता है।” गांववाले एक और बात के लिए मार्तिन से खुश थे। उस पर पुरा भरोसा किया जा सकता था। समझ लो, किसी ने उससे कहा, “भाई, मेरे लिए अगले शनिवार तक जूता जरूर बना देना,” और मार्तिन को लगा कि उस दिन तक जूता बन नहीं सकेगा तो वह साफ-साफ कह देता, “नहीं भैया, अगले शनिवार तक जूता नहीं बन सकता।” झूठमूठ वचन देना उसे पसंद नहीं था। मार्तिन वैसे तो बहुत भला आदमी था, लेकिन अब बुढ़ापे में बराबर सोचता था कि मैंने ईश्वर? की भक्ति नहीं की, कुछ दया-धरम नहीं किया। शुरू-शुरू में वह एक दूकान मे काम करता था। वह नौकरी थी दिन भर की। उसकी बीबी मर गयी थी और एक छोटा बच्चा छोड़ गयी थी। उसकी बाकी संताने बचपन में ही गुजर गयी थीं। मार्तिन ने सोचा, “अब यह इतना-सा बच्चा लेकर मैं क्या करूं? क्यों न इसे इसकी फूफी के घर भेज दूं?” फिर उसके मन में आया, “अब मेरा रहा कौन है? इतने छोटे बच्चे को दूर देश भेजकर मैं अकेला क्या करूंगा? और बच्चे को भी उस घर में अनजाना महसूस होगा। नहीं, नहीं, मैं इसे अपने पास ही रखूंगा और जैसे हो सके, इसकी परवरिश करूंगा।” उसने वह नौकरी छोड़ दी और अपने घर चला आया। अपना खुद्द का काम शुरू किया। लेकिन देखो उसकी बदनसीबी! मार्तित ने सोचा था, यह लड़का बड़ा होकर मेरे काम में मेरी मदद करेगा। मगर उस लड़के को बुखार आया और वह मौत का शिकार हो गया। मार्तिन ने उसको दफन किया। श्मशान से लौटते समय उसका दिल दुख से इतना भर आया था कि वह सह न सका और मारे दुख के ईश्वर को कोसने लगा : “ऐ भगवान, तुमने मेरे सारे बच्चे मुझसे छीन लिए। फिर मुझे क्यों यहां जिन्दा रखा है? मैं अकेला बुढ़ा अब क्या करूं?”


Format: Adaptive

Publisher: सृजन ड्रीम्स प्रा. लि