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घर से घर तक (चर्चित कहानियाँ) - Usha Kiran Khan

Description:

पद्मश्री आणि साहित्य अकादमी या प्रतिष्ठेच्या पुरस्कारांनी सन्मानित करण्यात आलेल्या लेखिका उषा किरण खान यांच्या सिद्धहस्त लेखणीतून साकारलेल्या कथांचा हा संग्रह आहे. This is a compilation of stories written by Padmashri and Sahitya Academy Award winner author Usha Kiran Khan.



वर्षों बाद मैं डॉक्टर बनकर अपने मामा के गाँव आयी तो सब कुछ बदला हुआ था। कच्ची सड़कें पक्की बन गयी थीं। अमराइयाँ कट चुकी थीं, वहाँ कारखाने बन गये थे। कॉलोनियाँ बसी हुई थीं। गंगा पर पुल तो कब का बन चुका था। दिन-रात ट्रकों-बसों की आवाज होती रहती थी। मेरे पति भी डॉक्टर थे और हम दोनों की ही नियुक्ति इसी इलाके में हुई थी। यहाँ आते ही जिस व्यक्ति की चर्चा सुनी थी, वह तुम ही थे। इलाके में कोई भी मार-पीट, खून-खच्चर, अनैतिक व्यापार होता था तो तुम्हारा ही नाम लिया जाता था। मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि वह तुम ही होगे, लेकिन एक दिन मेरी मामी ने ही बात उठायी। उन्होंने कहा था- ‘‘निगोडे़ का राजयोग था, गुण्डों और तस्करों का सम्राट बनकर सच्चा साबित कर दिया है। भला देखो, हमारे यहाँ रहकर इसने बैलगाड़ी चलाना शुरू किया था, अब कई ट्रकों का मालिक है। करोड़पति हो गया है। कैसे खूँखार काम करते हैं!’’ ‘‘आप किसके विषय में कह रही हैं, मामी?’’ ‘‘अरे, तुम्हें याद नहीं है बच्ची, एक सकलदीप सिंह था हमारे कामत पर? बैलगाड़ी में भूसा लादकर शहर की कोठी पर ले जाता था?’’ मेरे हृदय में बेतरह घबराहट समा गयी। बड़ी मुश्किल से मैं बोल पायी- ‘‘हा, याद है।’’ ‘‘अरे, वही शैतान। धीरे-धीरे एक टुटही गाड़ी-खाड़ी खरीद लाया। खगड़िया से मण्डी तक व्यापारियों का माल लाता, ले जाता। अब पता नहीं कैसे वही बेवकूफ तस्करी का बेमिसाल गुर पाकर प्रान्त का एकछत्र सम्राट हो गया है, समझ में नहीं आता है। उसे तो दस्तखत भी मुश्किल से करना आता था। खुद गरीबी में पला था, सो गरीबों के लिए, सुनते हैं, अब भी उसके मन में बड़ी ममता है। जब आता है, दस-पाँच बेटियों की शादी करा जाता है। सुनकर काया जुड़ाती है, लेकिन काम कैसा गैरकानूनी और खतरनाक करता है!’’ और उस दिन पहली बार मेरे मन में तुम्हारे लिए टीस-सी उठी। इतने दिनों से मैं मात्र उस घटना को, उस पीड़ा की पुलकन को और सबसे अधिक अनायास जगा दी गयी उस अनबुझ प्यास को याद करती थी, लेकिन उस दिन मैं तुम्हे स्मरण करने बैठी थी। मैं एक उच्च शिक्षिता लेडी डॉक्टर, आभिजात्य का गहरा संस्कार लिये; तुम एक अनगढ़, अनपढ़, अपराधी-और विडम्बना देखो कि मैं तुम्हे याद कर रही थी, तुम जीतेजी किवदन्ती जो बन गये थे। तुम्हारी सहृदयता की कहानियाँ बुरी तरह फैली हुई थीं। जन-साधारण में तुम मसीहा माने जाते थे। मुझे आश्चर्य होता, कैसे हुआ यह सब! इच्छा होती तुम्हें देखने की, कैसे लगते हो तुम अब। एक रात अचानक मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई थी। मैंने चट दरवाजा खोल दिया था। दूसरे लोग रात को दरवाजा खोलने में ड़रते थे वहाँ, पर मैं नहीं डरती थी। सामने तुम खडे़ थे। उसी प्रकार की खादी की ढीली-ढाली गोल गंजी, खादी की ऊँची धोती और कन्धे पर मोटा रंगीन तौलिया। क्षणांश में ही पहचान गयी मैं। जबकि १५ - २० वर्षों के अन्तराल के बाद देख रही थी तुम्हें। तुम्हारा चेहरा कातर था। तुमने एक छलाँग में दरवाजा पार किया और अन्दर से बन्द कर लिया। मैं स्थिर खड़ी थी। मेरे कन्धे को झकझोरकर तुमने अटपटी जबान में कहा, ‘‘बच्चीजी, मैं सकलदीप हूँ।’’ एक क्षण को तुम चुप हुए, नीचे देखा, फिर निगाह ऊपर करके कहा, ‘‘मेरी औरत को बच्चा होनेवाला है, तीन दिन से छटपटा रही है। उसका ऑपरेशन होना है, लेकिन पुलिस के पहरे में है वह। कोई डर के मारे उसे लाने नहीं जाएगा, डॉक्टर को नहीं बुलाएगा। मैं खतरों से खेलकर स्वयं आया हूँ। अब उसकी जान तुम्हारे हाथों में है।’’ कन्धे से उतरकर तुम्हारे हाथ मेरे हाथों में आ गये थे। मेरे आश्वासन को तुमने पहचान लिया था। चीते की फुर्ती से जैसे तुम आये थे, वैसे ही चले गये। मैं खड़ी रही। मैं अभी खड़ी ही थी कि पुलिस की जीप दरवाजे पर आकर लगी।


Format: Adaptive

Publisher: सृजन ड्रीम्स प्रा. लि